Monday, February 21, 2011

क्या चाहता हैं फुल ?

              
                       फुल हमेशा सबका आकर्षण का केंद्र बना रहता हैं! वो भला किचल मैं क्यों न खिला हो पर वो अपनी सुन्दरता की छाप छोड़ जाता हैं! दुसरोंको आकर्षित करना ही फूलो का स्वाभाव होता हैं! ऐसे ये फूल दुनिया के हर एक कोने में पाए जाते हैं! इनकी कई करोडो प्रकारोंको वैग्यनिकोने खोज निकला हैं! और आज भी उनके कुछ प्रकारोसे हम अपरिचित हैं!  
                         फुलोंको तो हर कोई जनता हैं! इनके खुशुबू से हर कोई परिचित हैं! हम इन्सान ही के पशु-पक्षियों को भी ये अपनी सुन्दरता और खुशबु की और आकर्षित करते हैं! ऐसे इन फूलो के कई प्रकार हैं! कोई अपने रंग से  हमें लुभाता हैं, तो कहीं वो अपने खुशबु से पागल करदेता हैं! कहीं वो अपने फूलो की खुशबु के नशें में हमें मुर्छित करसकता हैं, तो कहीं उग्ररूप धरी फूल हमें चोट भी पहुंचा सकता हैं! 
                      ऐसे ये फूल हमेशा भगवन के चरनोमे गले में हमेशा सजते रहते हैं! इन फूलों को पाना हम इन्सानोका एक नशा होता हैं! हर एक इन्सानका एक पसंदीदा फुल होता हैं और उनको देखना, सूंघना उन्हें पसंद होता हैं! एसे इन फूलो की महिमाही निराली हैं! ये सब बातें हर कोई जनता है! इसलियें मैं आपको फूलों के अपने मुद्देपर लेकर चलता हूँ!
                                                हमारा मुद्दा हैं , आखिर क्या चाहता हैं फुल ?.....
                                              
                 हाँ हम सब के करते हैं फूलो के सात! जब भी वो खिलते हैं अपनी सुन्दरता को इस निसर्ग का एक भाग बना लेते हैं  हम के करते हैं उनके साथ! 
  • सबसे पहले हम उस फुल को तोड़कर एक पूजा की थाली मैं सजाते हैं! उनको अपनी प्राथना के साथ अपने इष्ट भगवन के चरनोमें श्रधा पूर्वक अर्पण करते हैं! या उनको माला मैं गुंथकर भगवन के गले मैं चडाते हैं! 
  •  दूसरा महिलाएं फूलो को तोड़कर अपने बालो मैं लगाकर अपनी सुन्दरता बढाती हैं! या फिर उनको गजरे मैं गुंथकर बालो मैं वो गजरा लगाकर अपनी बालो की शोभा बदती हैं!
  • तीसरा हम फूलो को तोड़कर अपने घरके एक कोने मैं रखें गुल्दानी मैं फूलो को सजाते हैं, या फिर घरो के दरवाजो पर उनकी बनायीं माला लागतें हैं! 
  • चौथा  हम फुलोकों तोड़कर कभी हमारे पूर्वजो की समाधी पर चडाते हैं, तो कभी उनकी याद मैं उनके तस्वीर पर चढाते हैं! और कभी हम इन फुलोंको एक पार्थिव शारीर पर भी चढ़ा ते हैं! और उनकी अंतिम यात्रा मैं फूलो को भी अलविदा खादेते हैं!

                         तो अपने जीवन मैं इन चार प्रकारोसे हम फूलों को अपने पेड़ से अलग करते हैं! पर ये चारो प्रकार एक दुसरे से काफी भिन्न हैं! भगवानके पास उनको श्रधा के सात अर्पित करते हैं! और वैसे हैं महिलाएं  फूलो के सात अपनी सुन्दरता बदती हैं! कहीं  हम उनको अपने पूर्वजो की याद मैं चडाते हैं तो कहीं घर मैं अछे वतावर के लियें रखते हैं! 
                         फूल ये क्या चाहता हैं ......? हाँ , के हमें पता हैं की आखिर फूल क्या छठा हैं ...? 
कभी हमने ये जानने की कोशिश की , नहीं कभी नहीं!
                            क्या हम भगवन के सामने उनके चरणों पर अपने पवित्र मन का गुलदस्ता नहीं चाडा सकते, आखिर मनका फूल सबसे पवित्र और पवन फूल हैं ये हमारे पुरानो मैं लिखा हैं!  तो जब हम इंसानों के पास मन हैं तो के हम अपने मन को  पवत्र  करके उसको फूल रूप से अपने इष्ट को अर्पित नहीं करसकते! आखिर मनका फूल ही सर्वश्रेष्ट हैं! क्या हमारे पास मन ही नहीं हैं ..?
                           पुरानो मैं ये भी लिखा हैं की, " नारी साक्षात् इश्वर की पूर्ण कला हैं! " तो इस पूर्ण कला को जब भगवान ने रचा हैं, तो हम इन कलाओ मैं फूल लगा कर इश्वर की रचना का उनकी कला का अपमान क्यों करते हैं! क्या हम अपने भगवन का आदर नहीं करते हैं?
                            जब फूल के पेड़ो को हम अपने आंगन में सजाकर अपने घर की शोभा बढा सकते हैं, उनको गमलो मैं रख कर घरके वातावरण को पवित्र , आनंदी  बना सकते हैं, तो फिर हूँ उनको एक-दो दिनों के लियें तोड़कर फूलदानी मैं क्यों सजा ते हैं...?
                             हम अपने पूर्वजो की याद मैं, अश्रु भी चाडा सकते हैं, तो फीर फूल को अश्रुका रूप देकर चढाकर अपनी याद का दिखावा हम क्यों करते हैं! एक एक आत्मा शेरीर को छोड़कर चली गयी तो हम उनके साथ फूलो को भी ये निसर्ग छोड़ने पर क्यों मजबूर करते हैं! 

                              आखिर हम इन्सान ऐसा क्यों करते हैं क्यों की हमारे पास सोचने की ताकत हैं इसलियें! ऊपर की सभी बातो मैं हम इन्सान अपनी स्वार्थ के लियें फूलो की अली चढ़ा ते हैं! आखिर के हक हैं हमें, इस प्रकृति के साथ खिलवाड़  करनेका! फूल क्यों चाहेगा की वो भगवन के चरणों मैं छाडे  या गले का हार बने, आखिर उनको भी बनानेवाला वहीँ भगवन हैना, क्या भगवन कहेगा की हम उनपर फूल चढायें! एक घर कहेगा की उसके उंदर रहनेवाले पयार और समाधान के साथ उसमें रहें, वो क्यों चाहेगा की फूलो को घर मैं सजाओ, घर का आनंद खर्वालो की ख़ुशी मैं रहेगा ना! नारी की सुन्दरता सादगी मैं होती हैं, उनको फूल लगाकर दिखावा करनेकी के जरुरत हैं! और पूर्वजो की हमें याद हैं, इसिसे हमारे पूर्वजो की आत्मा खुश हो जाएगी! उनके सात दिखावा करनेका के फायदा! और मृत शरीर, जब आत्मा हिन् उसे छोड़ गई, उसे आत्मा के जाने का वियोग पता हैं,वो खुद फूलों को अपने पेढोसे दुरी का वियोग क्यों देना कहेगा! अपने साथ वो उनका  अंतिम संस्कार क्यों करना चाहेगा!  
                             आखिर फुल तो यही चाहेगा न की वो अपने पेड़ पर खिले, अपनी सुन्दरता बढ़ाएं, अपने रंग खुशबु से दुसरोका मन जितले. वो तो यहीं चाहेगा ना की वो हवा के झोके के सात नांचे , उसपर आनेवाले तीलियों, भवरों के साथ खेलें! फूल तो यहीं सदा चाहेगा की उसे मिली एक दिन की जिन्दगी मैं वो इस प्रकृतिका एक भाग बने इस श्रृष्टि का आनंद ले! वो यहीं चाहेगा की वो सदा अपने पेड़ पर खिला रहें और वहीँ पे वो मुरझाकर अपनी याद छोड़ जाएँ! 
                           इसलियें हम इंसानों को जो पुरानो मैं लिखा हैं वो समजना चाहिंए, प्रकृति के रहस्यों का पता लगाना चाहियें ! नाही की मुर्खता वश अपने स्वार्थ के लियें अपनी  साधना के लियें मुके पशु-पक्षी यों की बलि देनी चाहियें!
 

1 comment:

  1. it is very good
    i did not think about it
    thanks so much ..........

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